ज़िन्दगीनामा / Zindaginama by Krishna Sobti Download Free PDF

पुस्तक नाम : ज़िन्दगीनामा / Zindaginama
Book Language : हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज़ : 7.2 MB
  • कुल पृष्ठ : 329

  • प्रकाशक के आदेशानुसार हमें यह पुस्तक हटानी पड़ रही है।

    ज़िन्दगीनामा कृष्णा सोबती ‘ज़िन्दगीनामा’ एक ऐसा दिलचस्प उपन्यास है जिसमें न कोई नायक है और न खलनायक। इसमें पंजाब का एक गाँव है जिसमें रहते हैं ज़िन्दादिल, जाँबाज़ लोग…‘ज़िन्दगीनामा’ की कहानी इन्हीं लोगों के साथ बहती है और इन लोगों के साथ ही खेत-खलिहानों, पर्व-त्योहारों, लड़ाई-झगड़ों से गुज़रते हुए सूदखोर, साहूकारों और ग़रीब किसानों के दिलों का जायज़ा लेती है…आदमी और आदमी के बीच फ़र्क़ डालनेवाले क़ानून और ऐसे ही तमाम यथार्थ से गुज़रती हुई यह कहानी भारतीय जीवन-दर्शन को उसकी समग्रता में सहेजते-समझते हुए बढ़ती है और गढ़ती है कथ्य और शिल्प का एक नया प्रतिमान! ‘ज़िन्दगीनामा’ के पन्नों में आपको बादशाह और फ़क़ीर, शहंशाह, दरवेश और किसान एक साथ खेतों की मुँडे़रों पर खड़े मिलेंगे। ‘ज़िन्दगीनामा’ कृष्णा सोबती की विलक्षण भाषा-सामर्थ्य का भी परिचायक है। अपने भाषा संस्कार के घनत्व, जीवन्त प्रांजलता और सम्प्रेषण से कृष्णा सोबती ने हमारे समय के अनेक पेचीदा सच आलोकित किए हैं। ‘ज़िन्दगीनामा’ उनका ऐसा उपन्यास है जिसने हिन्दी के आधुनिक लेखन के प्रति पाठकों का भरोसा पैदा किया! किसी युग में, किसी भी भाषा में एक-दो लेखक ही ऐसे होते हैं जिनकी रचनाएँ साहित्य और समाज में घटना की तरह प्रकट होती हैं… और कहने की आवश्यकता नहीं कि ‘ज़िन्दगीनामा’ की लेखिका ऐसी ही हैं जो अपनी भावात्मक ऊर्जा और कलात्मक उत्तेजना के लिए प्रबुद्ध पाठक वर्ग को लगातार आश्वस्त करती रही हैं।

    इस पुस्तक के लेखक

    कृष्णा सोबती / Krishna Sobti
    + लेखक की अन्य किताबें

    कृष्णा सोबती मुख्यतः हिन्दी की आख्यायिका (फिक्शन) लेखिका थे। उन्हें 1980 में साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा 1996 में साहित्य अकादमी अध्येतावृत्ति से सम्मानित किया गया था। अपनी बेलाग कथात्मक अभिव्यक्ति और सौष्ठवपूर्ण रचनात्मकता के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने हिंदी की कथा भाषा को विलक्षण ताज़गी़ दी है। उनके भाषा संस्कार के घनत्व, जीवन्त प्रांजलता और संप्रेषण ने हमारे समय के कई पेचीदा सत्य उजागर किये हैं।

    कृष्णा सोबती का जन्म गुजरात में 18 फरवरी 1925 को हुआ था। भारत के विभाजन के बाद गुजरात का वह हिस्सा पाकिस्तान में चला गया है। विभाजन के बाद वे दिल्ली में आकर बस गयीं और तब से यहीं रहकर साहित्य-सेवा कर रही हैं। उन्हें 1980 में 'ज़िन्दगीनामा' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। 1996 में उन्हें साहित्य अकादमी का फेलो बनाया गया जो अकादमी का सर्वोच्च सम्मान है। 2017 में इन्हें भारतीय साहित्य के सर्वोच्च सम्मान "ज्ञानपीठ पुरस्कार" से सम्मानित किया गया है। ये मुख्यतः कहानी लेखिका हैं। इनकी कहानियाँ 'बादलों के घेरे' नामक संग्रह में संकलित हैं। इन कहानियों के अतिरिक्त इन्होंने आख्यायिका (फिक्शन) की एक विशिष्ट शैली के रूप में विशेष प्रकार की लंबी कहानियों का सृजन किया है जो औपन्यासिक प्रभाव उत्पन्न करती हैं। ऐ लड़की, डार से बिछुड़ी, यारों के यार, तिन पहाड़ जैसी कथाकृतियाँ अपने इस विशिष्ट आकार प्रकार के कारण उपन्यास के रूप में प्रकाशित भी हैं। इनका निधन 25 जनवरी 2019 को एक लम्बी बिमारी के बाद सुबह साढ़े आठ बजे एक निजी अस्पपताल में हो गया।

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