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वृहद वात्स्यायन कामसूत्र / Vrihad Vatsayayan Kamsutra in Hindi Download Free PDF / Kamasutra in Hindi PDF

पुस्तक नाम : वृहद वात्स्यायन कामसूत्र / Vrihad Vatsayayan Kamsutra
Book Language : हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज़ : 2.2 MB
  • कुल पृष्ठ : 148
  • श्रेणी:

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    कामसूत्र महर्षि वात्स्यायन द्वारा रचित भारत का एक प्राचीन कामशास्त्र (en:Sexology) ग्रंथ है। यह विश्व की प्रथम यौन संहिता है जिसमें यौन प्रेम के मनोशारीरिक सिद्धान्तों तथा प्रयोग की विस्तृत व्याख्या एवं विवेचना की गई है। अर्थ के क्षेत्र में जो स्थान कौटिल्य के अर्थशास्त्र का है, काम के क्षेत्र में वही स्थान कामसूत्र का है।

    अधिकृत प्रमाण के अभाव में महर्षि वात्स्यायन का काल निर्धारण नहीं हो पाया है। परन्तु अनेक विद्वानों तथा शोधकर्ताओं के अनुसार महर्षि ने अपने विश्वविख्यात ग्रन्थ कामसूत्र की रचना ईसा की तृतीय शताब्दी के मध्य में की होगी। तदनुसार विगत सत्रह शताब्दियों से कामसूत्र का वर्चस्व समस्त संसार में छाया रहा है और आज भी कायम है। संसार की हर भाषा में इस ग्रन्थ का अनुवाद हो चुका है। इसके अनेक भाष्य एवं संस्करण भी प्रकाशित हो चुके हैं, वैसे इस ग्रन्थ के जयमंगला भाष्य को ही प्रामाणिक माना गया है। कोई दो सौ वर्ष पूर्व प्रसिद्ध भाषाविद सर रिचर्ड एफ़ बर्टन (Sir Richard F. Burton) ने जब ब्रिटेन में इसका अंग्रेज़ी अनुवाद करवाया तो चारों ओर तहलका मच गया और इसकी एक-एक प्रति 100 से 150 पौंड तक में बिकी। अरब के विख्यात कामशास्त्र ‘सुगन्धित बाग’ (Perfumed Garden) पर भी इस ग्रन्थ की अमिट छाप है।

    महर्षि के कामसूत्र ने न केवल दाम्पत्य जीवन का शृंगार किया है वरन कला, शिल्पकला एवं साहित्य को भी सम्पदित किया है। राजस्थान की दुर्लभ यौन चित्रकारी तथा खजुराहो, कोणार्क आदि की जीवन्त शिल्पकला भी कामसूत्र से अनुप्राणित है। रीतिकालीन कवियों ने कामसूत्र की मनोहारी झांकियां प्रस्तुत की हैं तो गीत गोविन्द के गायक जयदेव ने अपनी लघु पुस्तिका ‘रतिमंजरी’ में कामसूत्र का सार संक्षेप प्रस्तुत कर अपने काव्य कौशल का अद्भुत परिचय दिया है।

    रचना की दृष्टि से कामसूत्र कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ के समान है—चुस्त, गम्भीर, अल्पकाय होने पर भी विपुल अर्थ से मण्डित। दोनों की शैली समान ही है— सूत्रात्मक। रचना के काल में भले ही अन्तर है, अर्थशास्त्र मौर्यकाल का और कामूसूत्र गुप्तकाल का है।

    नायिका-नायक भेद

    (The kinds of Women And Men)

    सम्भोग की दृष्टि से नायिका तीन की होती है:

    प्रथम अपनी पत्नी या अपने वर्ण की कुमारी कन्या,

    द्वितीय विधवा, रखैल और

    तृतीय वेश्या !,

    उपरोक्त तीनों प्रकार की नायिकाओं के साथ सम्भोग करने की कोई मनाही नहीं है ।

    आचार्य गोणिका पुत्र एक चौथे प्रकार की एक और नायिका का भी निर्देश करते है, वह है पर स्त्री । इसके साथ सन्तानोत्पत्ति या जाता बल्कि किसी विशेष उद्देश्य था प्रयोजन धन प्राप्ति, आत्मरक्षा या मैत्री बढ़ाने) से किया जाता है ।

    चारायण ऋषि एक पांचवीं नायिका भी मानते है इनके अनुसार राजा की पत्नी राज्य के अधिकारियों की पत्नियों और रनिवास में कार्य करने बाली विधवा भी नायिकाएं है। इनके साथ भी सम्भोग किया जा सकता है ।

    छठे प्रकार की नायिका सुवर्णनाभ के अनुसार विधवा सन्यासिनी को माना जा सकता है । घोटकमुख के मतामुसार वैश्या की लड़की और युवा नौकरानी (जो खण्डिता न हो) सातवें प्रकार की नायिका है ।

    आचार्य गोनर्दीय के अनुसार एक और आठवें प्रकार की नायिका होती है | यह है अपनी पत्नी जो बाल्याकाल समाप्त करके युवावस्था में प्रवेश करती है और जिसे सम्भोग-सुख का बिल्कुल भी ज्ञान नहीं होता।

    किन्तु वात्स्यायन आचार्य नायिकाओं के पहले चार भेद ही मानते है। उनके अनुसार अन्य चार प्रकार की नायिकाएं पहले चार भेदों के अन्तर्गत ही आ जाती है ।। किन्तु नपुंसकों की गणना न तो स्त्रियों में होती है और न पुरुषों में, फिर भी इनका उपयोग किसी-न-किसी प्रयोजन से होता ही है अतः ये पांचवीं प्रकार की नायिकाएं हुईं ।

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    वात्स्यायन / Vatsayayan

    वात्स्यायन या मल्लंग वात्स्यायन भारत के एक प्राचीन दार्शनिक थे। जिनका समय गुप्तवंश के समय (६ठी शताब्दी से ८वीं शताब्दी ) माना जाता है। उन्होने कामसूत्र एवं न्यायसूत्रभाष्य की रचना की। महर्षि वात्स्यायन ने कामसूत्र में न केवल दाम्पत्य जीवन का श्रृंगार किया है वरन कला, शिल्पकला एवं साहित्य को भी संपदित किया है। अर्थ के क्षेत्र में जो स्थान कौटिल्य का है, काम के क्षेत्र में वही स्थान महर्षि वात्स्यायन का है। वह भारत में दूसरी या तीसरी शताब्दी के दौरान थे, शायद पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) में।

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