विवेकानंद की आत्मकथा / Vivekanand Ki Atmakatha

स्वामी विवेकानंद नवजागरण के पुरोधा थे। उनका चमत्कृत कर देनेवाला व्यक्‍तित्व, उनकी वाक‍्‍शैली और उनके ज्ञान ने भारतीय अध्यात्म एवं मानव-दर्शन को नए आयाम दिए। मोक्ष की आकांक्षा से गृह-त्याग करनेवाले विवेकानंद ने व्यक्‍तिगत इच्छाओं को तिलांजलि देकर दीन-दुःखी और दरिद्र-नारायण की सेवा का व्रत ले लिया। उन्होंने पाखंड और आडंबरों का खंडन कर धर्म की सर्वमान्य व्याख्या प्रस्तुत की। इतना ही नहीं, दीन-हीन और गुलाम भारत को विश्‍वगुरु के सिंहासन पर विराजमान किया। ऐसे प्रखर तेजस्वी, आध्यात्मिक शिखर पुरुष की जीवन-गाथा उनकी अपनी जुबानी प्रस्तुत की है प्रसिद्ध बँगला लेखक श्री शंकर ने। अद‍्भुत प्रवाह और संयोजन के कारण यह आत्मकथा पठनीय तो है ही, प्रेरक और अनुकरणीय भी है।.विवेकानंद की आत्मकथा / Vivekanand Ki Atmakatha PDF, विवेकानंद की आत्मकथा / Vivekanand Ki Atmakatha PDF Download, विवेकानंद की आत्मकथा / Vivekanand Ki Atmakatha Book, विवेकानंद की आत्मकथा / Vivekanand Ki Atmakatha epub download ,विवेकानंद की आत्मकथा / Vivekanand Ki Atmakatha in Hindi PDF Download , विवेकानंद की आत्मकथा / Vivekanand Ki Atmakatha किताब डाउनलोड करें, विवेकानंद की आत्मकथा / Vivekanand Ki Atmakatha Kitab Download kro, विवेकानंद की आत्मकथा / Vivekanand Ki Atmakatha Read Online in Hindi Free, विवेकानंद की आत्मकथा / Vivekanand Ki Atmakatha Book Download Free, विवेकानंद की आत्मकथा / Vivekanand Ki Atmakatha Book by

स्वामी विवेकानंद नवजागरण के पुरोधा थे। उनका चमत्कृत कर देनेवाला व्यक्‍तित्व, उनकी वाक‍्‍शैली और उनके ज्ञान ने भारतीय अध्यात्म एवं मानव-दर्शन को नए आयाम दिए।

पुस्तक का अंश :

मेरा बचपन

संन्यासी का जन्म बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय के लिए होता है। दूसरों के लिए प्राण देने, जीवों के गगनभेदी क्रंदन का निवारण करने, विधवाओं के आँसू पोंछने पुत्र वियोग-विधुरा के प्राणों को शांति प्रदान करने, अज्ञ अधम लोगों को जीवन-संग्राम के उपयोगी बनाने, शास्त्रोपदेश-विस्तार के द्वारा सभी लोगों के ऐहिक पारमार्थिक मंगल करने और ज्ञानालोक द्वारा सबमें प्रस्तुत ब्रह्म सिंह को जाग्रत करने के लिए ही संन्यासियों का जन्म हुआ है। आत्मनो मोक्षार्थ जगदिधताय च’ हमारा जन्म हुआ है।’मेरे जन्म के लिए मेरे पिता-माता ने साल-दर-साल कितनी पूजा-अर्चना और उपवास किया था।मैं जानता हूँ, मेरे जन्म से पहले मेरी माँ व्रत-उपवास किया करती थी, प्रार्थना किया करती थीं और भी हजारों ऐसे कार्य किया करती थीं, जो मैं पाँच मिनट भी नहीं कर सकता। दो वर्षों तक उन्होंने यही सब किया। मुझमें जितनी भी धार्मिक संस्कृति मौजूद है, उसके लिए मैं अपनी माँ का कृतज्ञ हूँ। आज मैं जो बना हूँ, उसके लिए मेरी माँ ही सचेतन भाव से मुझे इस धरती पर लाई हैं। मुझमें जितना भी आवेश मौजूद है, वह मेरी माँ का ही दान हैं और यह सारा कुछ सचेतन भाव से है, इसमें बूंदभर भी अचेतन भाव नहीं है।मेरी माँ ने मुझे जो प्यार-ममता दी है, उसी के बल पर ही मेरे वर्तमान के ‘मैं’ की सृष्टि हुई है। उनका यह कर्ज मैं किसी दिन भी चुका नहीं पाऊँगा।जाने कितनी हो बार मैंने देखा है कि मेरे माँ सुबह का आहार दोपहर दो बजे ग्रहण करती हैं। हम सब सुबह दस बजे खाते थे और वे दोपहर दो बजे इस बीच उन्हें हजारों काम करने पड़ते थे। यथा, कोई आकर दरवाजा खटखटाता – अतिथि! उधर मेरी माँ के आहार के अलावा रसोई में और कोई आहार नहीं होता था। वे स्वेच्छा से अपना आहार अतिथि को दे देती थीं। बाद में अपने लिए कुछ जुटा लेने की कोशिश करती थीं ऐसा था उनका दैनिक जीवन और यह उन्हें पसंद भी था। इसी वजह से हम सब माताओं की देवी रूप में पूजा करते हैं।मुझे भी एक ऐसी ही घटना याद है जब में दो वर्ष का था, अपने सईस के साथ कौपीनधारी वैरागी बनाकर खेला करता था। अगर कोई साधु भीख माँगता हुआ आ जाता था तो घरवाले ऊपरवाले कमरे में ले जाकर मुझे बंद कर देते थे और बाहर से दरवाजे की कुंडी लगा देते थे। वे लोग इस डर से मुझे कमरे में बंद कर देते थे कि कहीं मैं उसे बहुत कुछ न दे डालूँ।

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