श्रीमद्भागवत गीता / Shrimad Bhagwat Gita Sadhak Sanjeevani (Sanskrit-Hindi) by Swami Ramsukhdas Maharajji Download Free PDF

पुस्तक नाम : श्रीमद्भागवत गीता / Shrimad Bhagwat Gita Sadhak Sanjeevani (Sanskrit-Hindi)
Book Language : हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज़ : 10.1 MB
  • कुल पृष्ठ : 1299

  • परम श्रद्धेय स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज ने गीतोक्त जीवन की प्रयोगशाला से दीर्घकालीन अनुसंधान द्वारा अनन्त रत्नों का प्रकाश इस टीका में उतार कर लोक-कल्याणार्थ प्रस्तुत किया है, जिससे आत्मकल्याणकामी साधक साधना के चरमोत्कर्ष को आसानी से प्राप्त कर आत्मलाभ कर सकें। इस टीका में स्वामी जी की व्याख्या एक विद्वत्ता-प्रदर्शन की न होकर अपितु सहज करुणा से साधकों के लिए कल्याणकामी है। 1299 पेज में प्रस्तुत यह श्रीमद भगवद गीता साधक संजीवनी टीका हर एक मानव के लिए सदगुरू की तरह सच्ची मार्गदर्शिका है।

    इस पुस्तक के लेखक

    स्वामी रामसुखदास महाराजजी / Swami Ramsukhdas Maharajji

    स्वामी राम सुखदास (१९०४ - ३ जुलाई २००५) भारतवर्ष के अत्यन्त उच्च कोटि के विरले वीतरागी संन्यासी थे। वे गीताप्रेस के तीन कर्णाधारों में से एक थे। अन्य दो हैं- श्री जयदयाल गोयन्दका तथा श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार।

    स्वामी रामसुखदास का जन्म राजस्थान के नागौर जिले के ग्राम माडपुरा में रूघाराम पिडवा के यहाँ सन् 1904 में हुआ। उनकी माता कुनणाँबाई के सहोदर भ्राता सदारामजी रामस्नेही सम्प्रदाय के साधु थे।

    ४ वर्ष की आयु में ही माताजी ने राम सुखदास को इनके चरणो में भेट कर दिया। किसी समय स्वामी कन्हीराम गाँवचाडी ने आजीवन शिष्य बनाने के लिए आपको मांग लिया। शिक्षा दीक्षा के पश्चात वे सम्प्रदाय का मोह छोडकर विरक्त (संन्यासी) हो गये और उन्होंने गीता के मर्म को साक्षात् किया और अपने प्रवचनो से निरन्तर अमृत वर्षा करने लगे। गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा संचालित साहित्य का आप वर्षो तक संचालन करते रहे। आपने सदा परिव्राजक रूपमें सदा गाँव-गाँव, शहरोंमें भ्रमण करते हुए गीताजीका ज्ञान जन-जन तक पहुँचाया और साधु-समाजके लिए एक आदर्श स्थापित किया कि साधु-जीवन कैसे त्यागमय, अपरिग्रही, अनिकेत और जल-कमलवत् होना चाहिए और सदा एक-एक क्षणका सदुपयोग करके लोगोंको अपनेमें न लगाकर सदा भगवान्‌में लगाकर; कोई आश्रम, शिष्य न बनाकर और सदा अमानी रहकर, दूसरोकों मान देकर, द्रव्य-संग्रह, व्यक्तिपूजासे सदा कोसों दूर रहकर, अपने चित्रकी कोई पूजा न करवाकर, लोग भगवान्‌में लगें ऐसा आदर्श स्थापित कर, गंगातट, स्वर्गाश्रम, हृषिकेशमें आषाढ़ कृष्ण द्वादशी वि॰सं॰२०६२ (दि. ३.७.२००५) ब्राह्ममुहूर्त में (3 बजकर 40 मिनिट) भगवद्-धाम पधारे।

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