सात घूंघट वाला मुखड़ा / Saat Ghunghat Waala Mukhda by Amritlal Nagar

पुस्तक नाम : सात घूंघट वाला मुखड़ा / Saat Ghunghat Waala Mukhda
लेखक :
Book Language : हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज़ : 2.5 MB
  • कुल पृष्ठ : 103

  • पुस्तक के कुछ अंश:

    अहाते की उजाड़ पड़ी रहने वाली खंडहर कोठरी में बशीर खाँ अपनी बन्दूक साफ कर रहा था।
    ज़रा-से खटके से उसकी सहमी हुई नज़रें चौंककर उठ जाती थीं। धूप गली के पीपल की चोटी से
    उतरकर अब सामने वाली छत की मुँडेर पर आकर पसर चुकी थी। बशीर खाँ की चोर नज़रों से
    जब पकड़े जाने का डर मिटा तो मुँडेर से नीचे उतरती हुई धूप उसे ऐसी लगी मानो कोई अल्हड़
    चिलबिली लड़की मुंडेर से टाँगें लटकाए बैठी हो और किसी भी वक्त झम्म से बशीर खाँ के अहाते
    में
    कूद पड़ने को तैयार हो। इस ख्याल से तबीयत में ताज़गी आई, जी हल्का ही नहीं खुश भी हो
    उठा। टोपीदार बन्दूक की सफाई नये जोश में होने लगी, मौन में हल्के-हल्के गाना भी शुरू कर
    दियाअगर आँ तुर्क शीराज़ी बदमस्त आरद दिलेमारा।
    बखाले हिन्दुपश बख्शम समरकंदो बुखारा था।
    बशीर खाँ के मन का चोर अब पूरी तरह से उसके काबू में आ चुका था। मुन्नी उर्फ दिलाराम
    को साफ-साफ यह बतलाना ही होगा कि गो वह उसे चाहता ज़रूर है पर उसका पिछले पाँच बरसों
    का इश्क महज़ एक फरेब था। उसके अब्बा ने जब मुन्नी को खरीदा था तब बैठकखाने में बेहोश
    पड़ी उस हुस्न के गुलाब की नायाब कली को देखकर कहा था, “यह हुकूमत करने के लिए पैदा
    हुई है, इस पर हुकूमत की नहीं जा सकती। बशीर को इसे इश्क के जादू से बाँधकर राह पर लाना
    होगा।” शकूर खाँ ने अपने आला तस्वीरनिगार और बड़ी-बड़ी दिलफरेब आँखों वाले बेटे को
    कसम दिला दी थी,”मैं तुम्हारी मर्दानगी और सआदतमन्दी का इम्तहान ले रहा ||

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