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पृथ्वी के छोर पर / Prithvi Ke Chhor Par by Dr. Sharadindu Mukerji Download Free PDF Hindi

पुस्तक नाम : पृथ्वी के छोर पर / Prithvi Ke Chhor Par
Book Language : हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज़ : 14 MB
  • कुल पृष्ठ : 260

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    इस पुस्तक में डॉ. शरदिन्दु मुकर्जी ने, उन यात्राओं के दौरान हुए अपने विभिन्न अनुभवों को साझा किया है। जटिल वैज्ञानिक तथ्यों से बोझिल न होकर अपनी रोचकता लिये पुस्तक में वर्णित तमाम घटनाक्रम, सभी वर्ग और वय के पाठकों के लिए रोमांचक कहानी की तरह ही नहीं, बल्कि भविष्य के अभियात्रियों के लिए मार्गदर्शक की तरह भी है।

    याद है, स्कूल में भूगोल की पाठ्य पुस्तक के किसी पन्ने पर पानी में तैरते हुये एक हिमखण्ड का स्केच बना हुआ था. स्मृति धुँधली पड़ गयी है पर इतना अवश्य विश्वास है कि मेरे परिचित परिवेश के बाहर किसी अद्भुत और अननुभूत संसार के प्रति कौतूहल की पहली किरण वहीं से फूटी थी. पर्वत से, प्रकृति से परिचित होना शुरू हो गया था लेकिन पानी में तैरता हुआ हिमखण्ड आज से साठ साल पहले मेरी कल्पना से परे था. माँ और पिताजी प्रकृति प्रेमी थे. अत: उस समय के अनुसार सीमित सुविधा और संसाधनों के बावजूद वर्ष में कम से कम एक बार दैनंदिन जीवन के चक्रव्यूह से बाहर निकलकर सपरिवार प्रकृति के सीधे संस्पर्श में कुछ दिन बिताकर आना हमारी आदत सी बन गयी थी. इसी क्रम में बाल्यावस्था से ही हिमालय से लेकर समुद्र तक की यात्रा हुई. पिता हिमालय के प्रति विशेष रूप से आकर्षित थे. फलस्वरूप मेरा बचपन भी हिमालय से आद्योपान्त जुड़ने लगा था. पुरी के समुद्र तट पर पहुँचा तो उत्तर से दक्षिण की ओर एक अदृश्य सांकेतिक रेखा खिंच गयी.

    कालांतर में यात्रा के मोह ने मुझे भूविज्ञान की ओर स्वत: खींच लिया, जिंदगी हर पल करवट ले रही थी. दुनिया की चकाचौंध ने कभी भी मुझे मोहित नहीं किया; मन अनायास ही प्रकृति के जाने-अनजाने रहस्यों के सौंदर्य सागर में डुबकी लगाता रहा. स्कूल के पाठ्य पुस्तक के उस स्केच में अब रंग भरने लगा था. हिमखंड के बारे में प्रारम्भिक ज्ञान शुरू हुआ और न जाने किस जन्म की अतृप्त आकांक्षा को पर लगने लगे. बीमारी के कारण वर्षों से ढोते हुए दुर्बल शरीर में स्फूर्ति आने लगी थी. एक दिन वह मोड़ आया जिसने मुझे नयी दिशा दी.

    लगभग सात महीने तक लगातार गुजरात की पूर्वी सीमा के एक अत्यंत वीरान स्थान में भूवैज्ञानिक मानचित्रण का दायित्व निभाकर जब जून 1982 में मुख्यालय अहमदाबाद पहुँचा तो पता चला कि कश्मीर में हिमनद अध्ययन पर विभागीय प्रशिक्षण शिविर लगने वाला है. सात • महीने के वनवास के बाद अहमदाबाद की आधुनिकता से मैं स्वयं को एकात्म नहीं कर पा रहा था. सामान्य कोशिश के उपरांत दो सप्ताह के अंदर ही मैं कश्मीर के स्वर्गिक वादियों में पहुँच गया. जुलाई 1982 में विश्वविख्यात अमरनाथ गुफा के सन्निकट नेह-नार हिमनद पर विभाग के चुने हुए युवा अधिकारियों को प्रशिक्षण देने का गुरुभार संभाला था भारत के विशिष्ट हिमनद विशेषज्ञ और भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के वरिष्ठ अधिकारी श्री महाराज कृश्न कौल ने. समुद्र तल से चौदह हजार फीट ऊपर खुले आकाश के नीचे बैठकर उन्हीं से सबसे पहले मैंने सुना, भारत के पहले अंटार्कटिका अभियान (1981-82) की कहानी और साथ ही यह भी जाना कि हमारे विभाग अर्थात भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण का इसमें कितना बड़ा योगदान हैं.

    हिमखंड के उस स्केच में, जिसमें कुछ वर्ष पहले ही रंग भरना शुरू हो गया था, अब चमक आने लगी थी. मेरा कृश और दुर्बल शरीर न जाने किस जादूगर की जादुई छड़ी के स्पर्श से अस्थिर होने लगा था. प्रशिक्षण के अंत में मैं अहमदाबाद वापस तो आ गया लेकिन हृदय छोड़ आया

    हिमालय की उन निर्मल ऊँचाईयों पर जहाँ से वह छलांग लगाकर कुमेरू की रहस्यमयी को बार-बार छूकर वापस आ जाता; प्यासे चातक की तरह एक वर्ष बाद, अगस्त 1983 में मुझे स्थानांतरित किया गया लखनऊ स्थित हिमनद विज्ञान प्रभाग में जिंदगी ने एक और करवट ली. मेरे निदेशक श्री विजय कुमार रैना मात्र कुछ महीने पहले ही भारत के दूसरे अंटार्कटिका अभियान को सफल नेतृत्व देकर वापस आये थे. श्री कौल भी उस दल के अति महत्वपूर्ण सदस्य थे. उन दोनों महानुभावों से वहाँ के संस्मरण सुनते हुए दिमाग में बैठा हुआ हिमखण्ड का वह स्केच अब जीवंत होने लगा था.

    तीसरे अभियान (1983-84) दल की घोषणा पहले ही हो चुकी थी. चौथे अभियान (1984-85) दल के लिए विभागीय सदस्य के चयन के बारे में पुष्ट धारणा बना ली गयी थी. ऐसी परिस्थिति में मुझे हिमनदीय अध्ययन हेतु गढ़वाल और कुमायूँ के हिमनद प्रधान क्षेत्रों में भेजा गया. मेरे हाथ में मानो स्वर्ग ही आ गया. हिमालय से पुरी के समुद्र तट तक जो लकीर खींच दी थी मेरे दिवंगत पिता ने वह और आगे

    बढ़ता हुआ बंगाल की खाड़ी पार करके क्षितिज को छूने लगा था. यहीं से शुरू होती हैं मेरी यह कहानी- पृथ्वी के छोर पर.

    यह कहानी मैं यहाँ लिपिबद्ध कर रहा हूँ आने वाले प्रजन्म के लिये जिससे अंटार्कटिका के अध्ययन से जुड़े भारतीय प्रयासों के प्रारम्भिक दिनों का इतिहास तेज़ी से बढ़ते हुए औद्योगिक विकास, तकनीकी क्रान्ति और बदलते हुए शैक्षणिक व्यवस्था से प्रभावित मानव मन की विशाल छाया में ओझल न हो जाये.

    अंटार्कटिका के वैज्ञानिक तथ्यों से इसे बोझिल बनाना मैंने उचित नहीं समझा. उसके लिए पाठक को बहुतेरे प्रामाणिक और उत्कृष्ट ग्रंथ उपलब्ध कराये जा सकते हैं. मैंने उन अनुभवों को साझा किया है जिन्हें हर अंटार्कटिक अभियात्री क़रीब से जानता है लेकिन देश का आम आदमी उनके प्रलेखन (Documentation) के अभाव में उसमें निहित रोमांच और रोगांस दोनों से वंचित रह गए।

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    डॉ. शरदिन्दु मुकर्जी / Dr. Sharadindu Mukerji
    डॉ. शरदिन्दु मुकर्जी अपने सैंतीस वर्षों के लम्बे कार्यकाल के दौरान लगभग छब्बीस वर्षों तक अंटार्कटिका में भूवैज्ञानिक अनुसंधानों से सम्बद्ध रहे हैं। इस अवधि में विभिन्न दायित्वों को निभाते हुए उन्होंने चार बार दक्षिण ध्रुवीय क्षेत्रों की यात्रा की है और दो बार वे शीतकालीन-दल के सदस्य के रूप में अंटार्कटिका में लगातार सोलह महीने रहे हैं।
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