पंचतन्त्र / Panchatantra by Vishnu Sharma Download Free PDF

पुस्तक नाम : पंचतन्त्र / Panchatantra
Book Language : हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज़ : 3 MB
  • कुल पृष्ठ : 110

  • दक्षिण देश के एक प्रान्त में महिलारोप्य नाम का नगर था। वहाँ एक महादानी, प्रतापी राजा अमरशक्ति रहता था। उसके पास अनन्त धन था; रत्नों की अपार राशि थी किन्तु उसके पुत्र बिल्कुल जड़बुद्धि थे। तीनों पुत्रों–बहुशक्ति, उग्रशक्ति, अनन्तशक्ति–के होते हुए भी वह सुखी न था। तीनों अविनीत, उच्छृंखल और मूर्ख थे। राजा ने विष्णुशर्मा को बुलाकर कहा कि यदि आप मेरे इन पुत्रों को शीघ्र ही राजनीतिज्ञ बना देंगे तो मैं आपको एक सौ गाँव इनाम में दूँगा। विष्णुशर्मा ने हँसकर उत्तर दिया–महाराज! मैं अपनी विद्या को बेचता नहीं हूँ। इनाम की मुझे इच्छा नहीं है। आपने आदर से बुलाकर आदेश दिया है, इसलिए छह महीने में ही मैं आपके पुत्रों को राजनीतिज्ञ बना दूंगा। यदि मैं इसमें सफल न हुआ तो अपना नाम बदल डालूंगा। आचार्य का आश्वासन पाकर राजा ने अपने पुत्रों का शिक्षण-भार उनपर डाल दिया और निश्चिन्त हो गया। विष्णुशर्मा ने उनकी शिक्षा के लिए अनेक कथाएँ बनाईं। उन कथाओं के द्वारा उन्हें राजनीति और व्यवहार-नीति की शिक्षा दी। उन कथाओं के संग्रह का नाम ही ‘पंचतन्त्र’ है। पाँच प्रकरणों में उनका विभाजन होने से उसे ‘पंचतन्त्र’ नाम दिया गया है। राजपुत्र इन कथाओं को सुनकर छह महीने में ही पूरे राजनीतिज्ञ बन गए। उन पाँच प्रकरणों के नाम हैं : 1. मित्रभेद 2. मित्रसम्प्राप्ति 3. काकोलूकीयम् 4. लब्धप्रणाशम् और 5. अपरीक्षितकारकम्।
    प्रस्तुत पुस्तक में पाँचों प्रकरण दिए गए हैं।

    महिलारोप्य नाम के नगर में वर्धमान नाम का एक वणिक्-पुत्र रहता था। उसने धर्मयुक्त रीति से
    व्यापार में पर्याप्त धन पैदा किया था। किन्तु उतने से उसे सन्तोष नहीं होता था; और भी अधिक
    धन कमाने की इच्छा थी। छह उपायों से ही धनोपार्जन किया जाता है-भिक्षा, राजसेवा, खेती,
    विद्या, सूद और व्यापार से। इनमें से व्यापार का साधन ही सर्वश्रेष्ठ है। व्यापार के भी अनेक प्रकार
    हैं। उनमें सबसे अच्छा यही है कि परदेश से उत्तम वस्तुओं का संग्रह करके स्वदेश में उन्हें बेचा
    जाए। यही सोचकर वर्धमान ने अपने नगर से बाहर जाने का संकल्प किया। मथुरा जाने वाले
    मार्ग के लिए उसने अपना स्थ तैयार करवाया। रथ में दो सुन्दर, सुदृढ़ बैल लगवाए। उनके नाम
    थे-संजीवक और नन्दका
    वर्धमान का रथ जब यमुना किनारे पहुँचा तो संजीवक नाम का बैल नदी तट की दलदल में
    फँस गया। वहाँ से निकलने की चेष्टा में उसका एक पैर भी टूट गया। वर्धमान को यह देखकर
    बड़ा दुःख हुआ। तीन रात उसने बैल के स्वस्थ होने की प्रतीक्षा की। बाद में उसके सारथि ने कहा
    कि इस वन में अनेक हिंसक जन्तु रहते हैं। यहाँ उनसे बचाव का कोई उपाय नहीं है। संजीवक के
    अच्छा होने में बहुत दिन लग जाएंगे। इतने दिन यहां रहकर प्राणों का संकट नहीं उठाया जा
    सकता। इस बैल के लिए अपने जीवन को मृत्यु के मुख में क्यों डालते हैं ?
    तब वर्धमान ने संजीवक की रखवाली के लिए रक्षक रखकर आगे प्रस्थान किया। रक्षकों
    ने भी जब देखा कि जंगल अनेक शेर, बाघ, चीतों से भरा पड़ा है, तो वे भी दो-एक दिन बाद ही
    वहां से प्राण बवाकर भागे और वर्धमान के सामने यह झूठ बोल दिया-स्वागी! संजीवक तो मर
    गया। हमने उसका दाह-संस्कार कर दिया। -वर्धमान यह सुनकर बड़ा दुःखी हुआ, किन्तु अब
    कोई उपाय न था
    इधर, संजीवक यमुना-तट की शीतल वायु के सेवन से कुछ स्वस्थ हो गया। नदी के
    किनारे की दूब का अग्रभाग पशुओं के लिए बहुत बलदायी होता है। उसे निरन्तर खाने के बाद….

    इस पुस्तक के लेखक

    विष्णु शर्मा / Vishnu Sharma
    + लेखक की अन्य किताबें

    पं॰ विष्णु शर्मा प्रसिद्ध संस्कृत नीतिपुस्तक पंचतन्त्र के रचयिता थे। नीतिकथाओं में पंचतन्त्र का पहला स्थान है। उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर कहा जा सकता है कि जब इस ग्रंथ की रचना पूरी हुई, तब उनकी उम्र ८० वर्ष के करीब थी। वे दक्षिण भारत के महिलारोप्य नामक नगर में रहते थे।

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