कुल्हड़ भर इश्क़: काशीश्क़ / Kulhad Bhar Ishq: Kashishq by Koshlendra Mishra Download Free PDF

पुस्तक नाम : कुल्हड़ भर इश्क़: काशीश्क़ / Kulhad Bhar Ishq: Kashishq
Book Language : हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज़ : 0.7 MB
  • कुल पृष्ठ : 107

  • दवा और प्रसाद उतना ही लेना चाहिए जितना देने वाले देते हैं, अधिक लेने के लिए जबर्दस्ती नहीं की जाती। इश्क की खुराक इतना आतुर करती है कि लोग खुद पर नियंत्रण नहीं रख पाते और अपनी तबीयत की औकात से ज्यादा ले लेते हैं फिर पढ़ाई पर गाज गिर जाती है। कुल्हड़ भर इश्क : काशीश्क, प्यार की शीशी पर मार्कर से गोला करके खुराक बताने वाला है जिससे ये पता चलता रहे कि कितना इश्क जीना है और कितनी पढ़ाई करनी है।
    कुल्हड़-सा सौंधापन है काशी के इश्क में, कुल्हड़ भर कहने से आशय इश्क को संकुचित करने से नहीं बल्कि नियमित और संतुलित मात्रा में सेवन से है।

    काशी हिंदू विश्वविद्यालय की कक्षा में तीन वर्ष बीए के गुजारने के बाद भी सुबोध चौबे जी की इच्छाओं की पूर्ति नहीं हो सकी थी। यहाँ भी वही हुआ, जो उनकी दसवीं व बारहवीं की कक्षाओं में होता आया था। सुबोध चौबे जी कक्षा में सबसे आगे वाली बेंच पर बैठते एकदम कोने में दीवार से लगकर, पूरी शांति से। मास्टर के लगभग हर सवाल का जवाब देने का प्रयास करते थे और फिर लड़कियों की पंक्ति पर एक बार दाँत निपोरते हुए नजर फेर लेते कि कहीं कोई प्रभावित हुए बिना तो नहीं रह गई। उन्हें लगता था एक दिन उनकी इस टिपटिपई से खुश होकर कोई लड़की खुद उनके पास आएगी और उनसे प्यार का इजहार करेगी।
    परंतु काशी हिंदू विश्वविद्यालय की कक्षाओं में वे ऐसा सोच भी नहीं पाते थे, क्योंकि कला संकाय में छात्र-छात्राओं की एक साथ स्नातक कक्षाएँ नहीं चलती थीं (संशोधन : कला संकाय की स्नातक कक्षाओं में 2017-2018 के सत्र से कुछ पाठ्यक्रमों में देवियों का प्रवेश हो चुका है)। सुबोध जी पहले-पहल तो प्रोफेसरों के कुछ सवालों के जवाब भी
    देते थे, पर थोड़े दिन बाद ही तत्वबोध हो गया कि यहाँ जब कोई कायदे का सुनने वाला ही नहीं, तो काहे इतनी मेहनत की जाए, लड़के तो वैसे ही ससुरे जलते रहते हैं।
    एक बात तो बताना भूल ही गए, सुबोध जी हिंदी ऑनर्स हैं। ऑनर्स का हिंदी अनुवाद ‘प्रतिष्ठा’ होता है और सचमुच, यही वो एकमात्र शब्द है जिसे बोलकर वे अपनी छाती फुलाकर बंडी फाड़ देते थे।
    जहाँ आजकल के लड़के खुद को आईआईटी, मेडिकल, सीए की तैयारी करने वाला बताकर मुहल्लों में चार-पाँच साल जींस फाड़कर आँख मारते चलते हैं, वहीं सुबोध जी केवल बीए बताकर जवाब में निकलने वाले शब्द बीएएएएएएए से बचने के लिए बिना देर किए ऑनर्स जोड़कर बीएचयू मेन कैंपस से बता देते थे। अगर यहाँ बनारस का बन्दा रहा, तो औकात समझ जाता, लेकिन अगर बाहरी होता, तो दो बार भौहें तानता और मुँह छितराकर कहता बीएचयूयूयूयूय और कामचलाऊ इज्जत भी बख्श देता। सचमुच दिल से एक बात बता दें, सुबोध जी को अपने बीएचयू में पढ़ने का यही गर्व था कि पूरे बनारस में कहीं भी गाड़ी लेकर पकड़े जाओ, तो बीएचयू की आईडी ही डीएल भी है और इंश्योरेंस पेपर भी। बीएचयू के नाम पर इज्जत देने वाले अंकल ऐसे ही इज्जत नहीं बख्शते थे, पूरा शुल्क लेते थे रिव्यू लिखने का! कब किस सोमवार की रात फोन कर दें- “बाबू, हम गाड़ी पकड़ लिए हैं, सुशांत शर्मा को दिखाना है (हम यानी हम लोग, मतलब पाँच से तो किसी कीमत पर कम नहीं)। सुबहे तनी जा के पर्चिया लगा देना, हम लोग गंगा जी….

    इस पुस्तक के लेखक

    कोशलेन्द्र मिश्र / Koshlendra Mishra

    इनका नाम, कोशलेन्द्र मिश्र इनके दादा रामकुमार मिश्र, जो ब्रम्ह विद्या मन्दिर संस्कृत महाविद्यालय वृन्दावन में प्राचार्य थे, द्वारा प्रदत्त है। इनके दादा की कर्मस्थली वृन्दावन ही इनकी जन्मस्थली है। उम्र इतनी कम कि अभी ये 22 साल के भी नहीं हुए हैं। इनकी माता मोदमणी मिश्रा एक कुशल गृहमैनेजर हैं। इनके पिता, डॉ. भूपेन्द्र कुमार मिश्र एक राजकीय इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य हैं और उनके ही विषय हिन्दी को अपना बनाकर ये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से परास्नातक की पढ़ाई करने जा रहे हैं। इन्होंने अपना बी.ए. (हिन्दी आनर्स) और बी.एड. (भाषा समूह) भी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बी.एच.यू) से ही पूरा किया है। इनकी बारहवीं तक की शिक्षा दो चरणों में संपन्न हुई। कक्षा एक से पाँच तक की शिक्षा इनके पड़ोस के गाँव के स्कूल से और कक्षा छह से बारहवीं तक प्रेम जागृति विद्यापीठ, देवरिया से जो एक ओजस्वी संन्यासी के तपोबल से अनैतिकताप्रूफ है। इनका मानना है कि इनका लेखन महज एक संयोग नहीं, वरन यह इनके परिवार की तीन पीढ़ियों की भाषा-साधना के नो बॉल से मिली फ्री हिट है।

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here

    Copy link
    Powered by Social Snap