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कलि का उदय : दुर्योधन की महाभारत / Kali Ka Uday – Duryodhan Ki Mahabharat

पुस्तक नाम : कलि का उदय : दुर्योधन की महाभारत / Kali Ka Uday - Duryodhan Ki Mahabharat
Book Language : हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज़ : 9 MB
  • कुल पृष्ठ : 333
  • श्रेणी:

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    कलि का उदय दुर्योधन की महाभारत महाभारत को एक महान महाकाव्य के रूप में चित्रित किया जाता रहा है I परंतु जहाँ एक ओर जय पांडवों की कथा है, जो कुरुक्षेत्र के विजेताओं के दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए प्रस्तुत की गई हैं, जो कुरुक्षेत्र के विजेताओं के दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए प्रस्तुत की गई है; वही अजेय उन कौरवों की गाथा है, जिनका लगभग समूल नाश कर दिया गया I कलि के अंधकारमयी युग का उदय हो रहा है और प्रत्येक स्त्री व् पुरुष को कर्त्तव्य और अंतःकरण, प्रतिष्ठा और लज्जा, जीवन और मृत्यु के बीच चुनाव करना होगा… पांडव: जिन्हें जुए के विनाशकारी खेल के बाद वन के लिए निष्कासित किया गया था, हस्तिनापुर वापस आते हैं I द्रौपदी: जिसने प्रतिज्ञा ली है कि कुरुओं के रक्त से सिंचित किए बिना अपने बाल नहीं बाँधेगी I कर्ण : जिसे निष्ठा और आभार, तथा गुरु और मित्र के बीच चुनाव करना होगा I अश्वत्थामा: जो एक दृष्टि के संधान के लिए गांधार के पर्वतों की और एक घातक अभियान पर निकलता है I कुंती: जिन्हें अपनी पहली संतान तथा अन्य पुत्रों के बीच चुनाव करना होगा I गुरु द्रोण: जिन्हें किसी एक का साथ देना होगा – उनका प्रिय शिष्य अथवा उनका पुत्र I बलराम: जो अपने भाई को हिंसा के अधर्म के विषय में नहीं समझ पाते, वे शांति का संदेश प्रचारित करने भारतवर्ष की सड़कों पर निकल पड़ते हैं I एकलव्य: जिसे एक स्त्री के मान की रक्षा के लिए अपनी बलि देनी पड़ी I जरा : वह भिक्षुक जो कृष्णा की भक्ति में मग्न होकर गीत गाता रहता है और उसका नेत्रहीन श्वान ‘धर्म’ उसके पीछे चलता है I शकुनि : वह धूर्त जो भारत को विनष्ट करने के स्वप्न को लगभग साकार होते हुए देखता है I जब पांडव हस्तिनापुर के राजसिंहासन पर अपना दावा प्रस्तुत करते हैं, तो कौरवों का युवराज सुयोधन कृष्ण को चुनौती देने के लिए प्रस्तुत हो जाता है I जहाँ महापुरुष धर्म और अधर्म के विचार पर तर्क-वितर्क करते हैं, वहीँ सत्ता के भूखे मनुष्य एक विनाशकारी युद्ध की तैयारी करते हैं I उच्च वंश में जन्मी कुलीन स्त्रियाँ किसी अनिष्ट के पूर्वाभास के साथ अपने सम्मुख विनाश की लीला देख रही हैं I लोभी व्यापारी तथा विवेकहीन पंडे-पुरोहित गिद्धों की भाँति प्रतीक्षारत हैं I दोनों ही पक्ष जानते हैं कि इस सारे दुःख तथा विनाश के पश्चात् सब कुछ विजेता का होगा I परंतु जब देवता षड़यंत्र रचते हैं और मनुष्यों की नियति बनती है, तो एक महान सत्य प्रत्यक्ष होता है I

    लज्जा

    द्रौपदी जानती थी कि वह लौट कर आएगा। उसने अपनी दंभपूर्ण दृष्टि से संदेशवाहक को देखते हुए वापस लौटा दिया था ताकि उसे अपने लिए कुछ समय मिल सके। उसने उसे वापस भेजते हुए, सभा में बैठे वयोवृद्ध जन के लिए एक प्रश्न भिजवाया था उसके पतियों ने जब उसे दाँव पर लगाया तो क्या उस समय वे सब भी दास बन गए थे या दास बनने से पूर्व उसे दाँव पर लगाया गया था। अपने स्वामी के स्वामित्व में रहने वाले दास के पास न तो अपनी कोई संपत्ति होती है और न ही कोई अधिकार, इस प्रकार वे उसे दाँव पर रख ही नहीं सकते थे। संदेशवाहक भ्रमित होकर प्रणाम किया और उसके शब्दों को सभा तक पहुँचाने के लिए दौड़ता हुआ गया द्वार अभी भले ही बंद हो गया था परंतु द्रौपदी के मन पर धीरे-धीरे युधिष्ठिर के इस कृत्य की विकरालता स्पष्ट होने लगी थी। वह भाँप सकती थी कि जब उसका प्रश्न सभा में पूछा जाएगा तो वहाँ कैसी निःशब्द चुप्पी छाई होगी।

    जब उसने सीढ़ियों से भारी पदचाप की आहट सुनी तो जैसे वह श्वास लेना भी भूल गई। वे उसे लेने आ रहे थे। द्रौपदी के शब्द भी उन्हें रोक नहीं पाए वह दीवार की ओर पीठ किए खड़ी थी, छाती में दिल तेज़ी से धड़क रहा था। सिर के केशों से लेकर पैर की अंगुलियों तक भय रेंग उठा। उसने अपने तन पर पड़ी एकमात्र साड़ी को कसकर भींच लिया, जो यह संकेत देती थी वह उन दिनों रजस्वला थी कक्ष की दूसरी महिलाएँ गहरी चुप्पी के बीच मुँह बाए खड़ी थीं। अचानक किसी ने लात मार कर द्वार खोला। राजकुमार सुशासन दहलीज़ के दोनों ओर एक एक पैर जमाए खड़ा था, उसके तमतमाए हुए मुख पर तिरछी मुस्कान थी। वह द्रौपदी की ओर लपका किंतु सुभद्रा बीच में आ गई। सुशासन ने रुक्षता से सुभद्रा को परे धकेला और द्रौपदी को उसे घने, लंबे केशों से पकड़कर दुष्टता से खींचने लगा। वह मारे पीड़ा के उसके पैरों पर गिर पड़ी।

    ‘वह मेरे साथ ऐसा क्यों कर रहा है? मेरे पति कहाँ है?’ द्रौपदी के मन में असंख्य विचारों का रेला उमड़ पड़ा। वह कष्ट तो सह सकती थी किंतु उससे अपमान सहन नहीं होता था। उसने पलंग का किनारा, द्वार आदि जो हाथ में आया, उसे पकड़ते हुए स्वयं को बचाना चाहा, ताकि सुशासन उसे इस तरह आधे-अधूरे वस्त्रों में घसीटते हुए सभा में न ले जा सके। किंतु सोमरस और वासना के मद में चूर कौरव राजकुमार के आगे उसके बल की कोई बिसात नहीं थी। राजपरिवार की स्त्रियों विस्फारित दृष्टि से, इस अमानवीय और क्रूर तमाशे को देख रही थीं। एक शब्द तक नहीं कहा गया; केवल द्रौपदी की करुण विनती और राजकुमार की हास्यलहरी ही गलियारे में गूँज रही थी।

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    आनंद नीलकंठन / Anand Neelakantan
    भारतीय लेखक आनंद नीलकंठन को 2012 के सबसे सफल लेखकों में से एक के रूप में चुना गया था। वह अपनी पहली पुस्तक, ‘असुरा’ के लिए जाने जाते हैं, उनकी पहली पुस्तक जो बेस्टसेलर बन गई और अपने लॉन्च के एक सप्ताह के भीतर शीर्ष विक्रेता चार्ट में प्रवेश किया। वह डेक्कन क्रॉनिकल, द न्यू इंडियन एक्सप्रेस और द वॉल स्ट्रीट जर्नल में एक स्तंभकार हैं।
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