ग्यारहवीं A के लड़के / Gyarahvin A ke Ladke by Gaurav Solanki Download Free PDF

पुस्तक नाम : ग्यारहवीं A के लड़के / Gyarahvin A ke Ladke
Book Language : हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज़ : 5.46 MB
  • कुल पृष्ठ : 122

  • गौरव सोलंकी नैतिकता के रूढ़ खाँचों में अपनी गाड़ी खींचते-धकेलते लहूलुहान समाज को बहुत अलग ढंग से विचलित करते हैं। और, यह करते हुए उसी समाज में अपने और अपने हमउम्र युवाओं के होने के अर्थ को पकडऩे के लिए भाषा में कुछ नई गलियाँ निकालते हैं जो रास्तों की तरह नहीं, पड़ावों की तरह काम करती हैं। इन्हीं गलियों में निम्न-मध्यवर्गीय शहरी भारत की उदासियों की खिड़कियाँ खुलती हैं जिनसे झाँकते हुए गौरव थोड़ा गुदगुदाते हुए हमें अपने साथ घुमाते रहते हैं। वे कल्पना की कुछ नई ऊँचाइयों तक किस्सागोई को ले जाते हैं, और अकसर सामाजिक अनुभव की उन कंदराओं में भी झाँकते हैं जहाँ मुद्रित हिन्दी की नैतिक गुत्थियाँ अपने लेखकों को कम ही जाने देती हैं।इस संग्रह में गौरव की छह कहानियाँ सम्मिलित हैं, लगभग हर कहानी ने सोशल मीडिया और अन्य मंचों पर एक खास किस्म की हलचल पैदा की। किसी ने उन्हें अश्लील कहा, किसी ने अनैतिक, किसी ने नकली। लेकिन ये सभी आरोप शायद उस अपूर्व बेचैनी की प्रतिक्रिया थे, जो इन कहानियों को पढक़र होती है।कहने का अंदाज गौरव को सबसे अलग बनाता है, और देखने का ढंग अपने समकालीनों में सबसे विशेष। उदारीकृत भारत के छोटे शहरों और कस्बों की नागरिक उदासी को यह युवा कलम जितने कौशल से तस्वीरों में बदलती है, वह चमत्कृत करनेवाला है।

    कितनी तो मुहब्बत मिली तुम्हें
    o
    अब याद आता है तो लगता है कि और ही दिन थे वे, जब ये कहानियाँ लिखी गई थीं। एक जुनूनसा था, एक लम्बा बुखार जैसे, जिसमें मेरे पास कोई और विकल्प नहीं था सिवा इसके, कि
    लिखता रहूँ। और उस बुखार में सुकून था।
    बस पैसे कम थे, पर यह उतना महसूस भी नहीं होता था। क्योंकि पैसे कमाने का जो ऑप्शन था उस वक्त, जो डिग्री थी मेरे पास, मैं उससे दूर जाना चाहता था। आईआईटी का बहुत
    नाम था| बहुत मुश्किल से दाखिला होता था। इसलिए सब कहते थे कि अब दाखिल ही रहो, इसी
    दुनिया में। पर मैं भाग निकलना चाहता था, इसलिए भाग निकला।
    इंजीनियरिंग वाला काम कुछ महीने में ही छोड़ दिया था। एक तरह से मुश्किल दिन थे, एक
    तरह से बहुत आसान। ‘तहलका’ में लिखता था और यह मुझे याद नहीं रहता था कि पैसा भी
    कमाना है।
    एक लड़की थी जिससे इश्क़ करता था, और जिसने मुझे बचाए रखा| कभी-कभी खुद की क़ीमत पर भी। पर ये कहानियाँ थोड़ा पहले शुरू हुई। सबसे पहले ‘यहाँ वहाँ कहाँ। उसका काफी हिस्सा कॉलेज में ही लिखा था, 2008 में| फिर कॉलेज से निकलने के अगले कुछ महीनों में ‘तुम्हारी बाँहों में मछलियाँ क्यों नहीं हैं’ और ‘सुधा कहाँ है’ लिखी, 2008 के आखिर तका फिर अगले कुछ महीनों में ‘ब्लू फिल्म’ लिखी गई, अलग-अलग शहरों में रहते हुए, बेयक़ीनी और नाउम्मीदी के बीच इन सलाहों के बीच कि सरकारी इंजीनियर ही बन जाओ कम से कम कुछ दिन उस घर में रहा, जहाँ बचपन बीता था। फिर दिल्ली लौट आया। कहानी कभी हफ्तों

    इस पुस्तक के लेखक

    गौरव सोलंकी / Gaurav Solanki

    गौरव सोलंकी का जन्म 7 जुलाई, 1986 को हुआ। बचपन संगरिया (राजस्थान) में बीता। आईआईटी रुडक़ी से इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन के बाद गौरव कुछ साल ‘तहलका’ के लिए सिनेमा और समाज पर भी लिखते रहे। 2014 में आई फिल्म ‘अग्ली’ के गीत लिखे। फैंटम फिल्म्स ने इनकी कहानी ‘हिसार में हाहाकार’ पर फिल्म बनाने के अधिकार भी खरीदे हैं। इनकी स्क्रिप्ट ‘निसार’ 2016 में ‘दृश्यम सनडैंस स्क्रीनराइटर्स लैब’ के लिए चुनी गई। अभी मुम्बई में रहते हैं।

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