देहाती लड़के / Dehaati Ladke by Shashank Bharatiya Download Free PDF

पुस्तक नाम : देहाती लड़के / Dehaati Ladke
Book Language : हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज़ : 4.3 MB
  • कुल पृष्ठ : 204

  • वो लड़के होते हैं ना, जो पहली बार शहर आते हैं। आँखों में भारत के चुनिंदा क्लेम टू फेम एसएससी, बैंकिंग और यूपीएससी का सपना और बस्ते में गाँव से भेजा गया देसी घी और अचार लिए। इंटर कॉलेज के कुएँ से निकलकर, यूनिवर्सिटी के तालाब में डर-डरकर कदम रखते हुए। जवानी के बेहतरीन दिनों में कमरे में बंद रीजनिंग और मैथ्स लगाते हुए। बस वैसे ही एक लड़के की कहानी है ये। आया तो है उम्मीदें, उमंगें और उसूल लेकर, मगर उस गुस्ताख़ उम्र का क्या किया जाए? पक्की वाली दोस्ती भी इसी में होती है, कोई अच्छा भी लगने लगता है और लक्ष्य भी हासिल करने होते हैं। इन सबको समेटने में कुछ-कुछ तो है जो छूट जाता है… इस कुछ-कुछ के आसपास बुनी हुई कहानी है- देहाती लड़के।

    कॉफी की आखिरी चुस्की लेते हुए मैंने सड़क की दूसरी तरफ खड़ी इमारत की ओर देखा।
    दीवार पर उभरे सुनहरे भव्य अशोक चिह्न के ठीक ऊपर वाली घड़ी दो बजकर तीन मिनट बजा चुकी थी। सूरज की तिरछी किरणें अशोक चिह्न के नीचे, मोटे सुनहरे अक्षरों में लिखे ‘भारत सरकार’ को दमका रही थीं। आगे की तख्ती पर ‘कोष मूलो दण्डः’ सुशोभित कारों का काफिला दो मिनट पहले ही रवाना हुआ था। सड़क पर दूर तक फैली पीपल की चरमराती हुई पत्तियाँ थोड़ी दूर उड़कर कारों के साथ गई थीं, फिर चौराहे पर खड़े, दांडी जाने को उद्धत बापू के पास जाकर थिरा गई थीं। उड़ी हुई धूल और धुएँ का गुबार पट रहा था और दहलीज तक छोड़ने आए अफसरान वापस बिल्डिंग में लौट रहे थे। सिक्यूरिटी हेड कमलेश के हाथों ने आज औसत से तीन गुना ज्यादा ‘जय हिंद’ किया था। साहबों के अंदर जाने के बाद वह वापस अपनी कुर्सी पर जाकर बैठ गया था। मैंने कॉफी खत्म करके कप
    प्लेट में रखा, प्लेट के नीचे की पर्ची निकाली और काउंटर की तरफ चला आया। होटल मैनेजर सुनील ने पर्ची मेरे हाथ से ली और बिना देखे बगल रखी कील में घोंप दी। उसे पता है
    कि बिल पिछले 3 सालों से बिला नागा 25 रुपया ही है। फुटकर पैसे वापस करते हुए बोला, “बड़े साब आए थे… आप नहीं गए?” मैंने पैसे समेटकर जेब में डाले और उसकी आँखों में
    देखा। वक्ती तौर पर लगा कि उसे जवाब दूंगा, मगर मुस्कुराया और होटल से बाहर निकल आया। सड़क पार की और इमारत की सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। 53 साल पहले बनी यह इमारत बाहर से जितनी उदासीन दिखती है, अंदर से उतनी ही भव्य है। भारत सरकार के अन्य दफ्तरों की तरह जर्जर नहीं। दहलीज पार कर एक गोल बरामदा है, जहाँ सोफे पड़े हैं। जिसके ऊपर की गुंबदाकार छत शीशे की है। फिर लगभग सौ फीट लंबा गलियारा है। गलियारे के दोनों तरफ अधिकारियों के दफ्तर हैं, जिनके सामने उनके नाम और प्रभार की तख्तियाँ लगी हैं। हर दस फुट पर प्लास्टिक फूलों के गमले रखे हैं। गलियारा खत्म होते ही
    फिर एक गोल बैठक है, जहाँ से तीन तरफ को रास्ते गए हैं। तीनों तरफ अलग-अलग विंग के ऑफिस हैं। चौथी मंजिल तक बिल्डिंग का ढाँचा ऐसा ही है।

    इस पुस्तक के लेखक

    शशांक भारतीय / Shashank Bharatiya

    गोंडा में जन्मे और पले-बढ़े शशांक ने अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी की और सौभाग्यवती यूनिवर्सिटी से पीजी किया। वर्तमान में वह आयकर, विभाग में एक निरीक्षक के रूप में काम कर रहे हैं, लेकिन हिंदी साहित्य के क्षेत्र में अपना करियर बनाने की इच्छा रखते हैं। अभी वह हिंदी साहित्य में डॉक्टरेट की तैयारी कर रहे है।

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