भूतों के देश में: आईसलैंड (यात्रा) / Bhooton ke desh mein: Iceland by Praveen Jha Download Free PDF Hindi

पुस्तक नाम : भूतों के देश में: आईसलैंड (यात्रा) / Bhooton ke desh mein: Iceland
Book Language : हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज़ : 4 MB
  • कुल पृष्ठ : 55

  • जादू टोना और जादू की रहस्यमय भूमि में, एक अप्रत्याशित भूमि में भूतों और ट्रोल्स के माध्यम से एक मार्ग - आइसलैंड। आइसलैंड के इलाक़ों और इसकी संस्कृति से लेखक का गुजरना एक रोमांचकारी अनुभव है, जिसे जल्दबाज़ी में बताया गया है। पुस्तक अनिवार्य रूप से एक भूत की कहानी नहीं है, लेकिन इस अजीब भूमि के माध्यम से एक यात्रा है। ज्वालामुखी, फूटते परिदृश्य, निरंतर भूकंपीय लहरें और भूकंप, बर्फीले तूफान, और बंजर बर्फ से ढकी भूमि की गहन चुप्पी की भूमि। वाइकिंग्स का एक छुपा निवास जो अभी भी वाइकिंग्स की भाषा बोलता है, किनारों पर रहता है, ज्वालामुखीय झीलों में स्नान करता है, और भूतों पर विश्वास करता है। वह भूमि जहाँ सड़कें बस गायब होने लगती हैं और कहीं से फिर से दिखाई देने लगती हैं, एक को छोड़कर कहीं नहीं। एक यात्रा जो 'गेम ऑफ थ्रोंस' में ले जाती है, यात्री को एक वाइकिंग में बदल देती है।

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    प्रेतों से पहली मुलाकात मेरी गाँव में ही हुई होगी। शहर में प्रेत नहीं मिलते। जैसे भेड़-बकरी कम
    नजर आते हैं, रात को तिलचट्टे की आवाज कम सुनाई देती है, जुगनू नहीं दिखते, वैसे ही प्रेत भी
    नहीं दिखते। प्रेतों की खासियत है कि उनको शांति पसंद है। जरा भी हलचल हुई, प्रेत बेताल की
    तरह फुर्र हो जाएँगे| गर आदमियों के बीच हो-हल्ले में ही रहना होता, तो आखिर प्रेत क्यों बनते?
    गाँव में तो यूँ ही छुटपन में प्रेत दिख जाते। कभी डर जाता, कभी ध्यान ही न देता। वो पीपल के
    पेड़ पर दिख गए, तो सड़क छोड़ खेतों में उतर जाता। गर वो खेतों में दिख गए, तो हाथ में मिट्टी
    का ढेला ले कर तेज कदम चलने लगता। मिट्टी से डरते हैं प्रेता डरते हैं कि जिस मिट्टी से निकले
    हैं, उसी में न वापस मिल जाएँ। इसलिए गाहे-बगाहे उड़ते रहते हैं, या पेड़ की शाखा पर जा बैठते
    हैं। पीपल पर, बबूल पर, इगली पर, जागुन पर, मौलश्री पर, या किसी पुराने बरगद परा दरअसल
    गाँव में प्रेत भी सर्वहारा का ही हिस्सा हैं। पार्ट ऑफ़ फैमिली। उनसे कोई खौफ नहीं| कई प्रेत तो
    अपने परिजनों के अंदर ही होते हैं, जो अजीब सी हरकतें करने लगते हैं। उनसे भय नहीं होता, पर
    उनकी चिंता होती है। इलाज वगैरा होता है, झाड़-फूंक भी। और प्रेत भी थक-हार कर कहते हैं कि
    दूसरा शरीर पकड़ लो, यहाँ तो बड़ी दुर्गति है। यह कितना सुंदर स्वरूप होगा प्रेतों का! कभी इस
    शरीर तो कभी उस शरीरा एक हम हैं कि उसी शरीर में अटके पड़े हैं। कभी तोंद निकल जाती है,
    कभी खाज-खुजली, तो कभी नाक बहना| प्रेत के जीवन में यह तमाम झंझट हैं ही नहीं।
    गाँव के प्रेतों से मुलाकात कुछ खास नहीं रही। वो नेपथ्य में हर जगह ही थे, पर खुल कर मंच पर
    नहीं आए।
    पहली बार जब प्रेतों से औपचारिक भेंट हुई, तभी उनसे बतिया पाया, उन्हें समझ पाया। बंगाल के
    तारापीठ का श्मशान प्रेतों का एक कॉरपोरेट ऑफीस है। वहाँ देश के गणमान्य प्रेत जुटते हैं,
    शास्त्रार्थ करते हैं। मैं जब तारापीठ पहुँचा और वहाँ के लंबे-लंबे गुलाबजामुन देखे, तभी समझ
    गया कि यह स्थल ही विकृत है। श्मशान के मध्य मंदिर बना रखा है, और परिसर में कंकाल….

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    इस पुस्तक के लेखक

    प्रवीण कुमार झा / Praveen Kumar Jha
    + लेखक की अन्य किताबें

    डॉ. प्रवीण झा एक सफल सुपरस्पेशलिस्ट डॉक्टर होने के अलावा एक उत्साही व्यंग्यभाषी ब्लॉगर हैं। उनका उपनाम 'वामनगढ़ी' है और उन्होंने कई छोटे हिंदी ब्लॉगों को प्रकाशित किया है, जिसे काफी सराहा गया है। लेखक ने अपना बचपन बिहार में बिताया, और पुणे, नई दिल्ली, बैंगलोर और शिकागो जैसे शहरों में अपने चिकित्सा कैरियर के माध्यम से रवाना हुए। वर्तमान में, लेखक कोंग्सबर्ग, नॉर्वे में रहता है। लेखन के प्रति लेखक की लगन हिंदी में उनकी पहली काल्पनिक पुस्तक- चमनलाल की डायरी के कारण बनी।

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