भली लड़कियाँ, बुरी लड़कियाँ / Bhali Ladkiyan, Buri Ladkiyan

पुस्तक नाम : भली लड़कियाँ, बुरी लड़कियाँ / Bhali Ladkiyan, Buri Ladkiyan
Book Language : हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज़ : 1.6 MB
  • कुल पृष्ठ : 228

  • पूजा प्रकाश बिहार के एक छोटे से शहर से अपने सपनों का सूटकेस उठाए दिल्ली चली आती है। अठारह साल की उम्र में ही उसकी आँखों ने पुलिस अफ़सर बनने का मुश्किल सपना तो देख लिया है, लेकिन दिल्ली की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी के संघर्ष उन सपनीली आँखों की किरकिरी बन जाते हैं। ‘भली लड़कियाँ, बुरी लड़कियाँ’ की बुनावट की नींव में रोज़-रोज़ की यही जद्दोज़ेहद है, जिसका सामना दिल्ली शहर में रहनेवाली हर लड़की किसी न किसी रूप में करती है। यह उपन्यास जवानी की दहलीज़ पर क़दम रखती पूजा प्रकाश के प्रेम में पड़ने, धोखे खाने, और उन धोखों से सबक लेते हुए अपने तथाकथित प्रेमी को सबक सिखाने की सतर्क चालें बुनने की कहानी बयाँ करता है।

    यह कहानी जितनी पूजा की है, उतनी ही उसके साथ उसकी पीजी में रहनेवाली लड़कियों—मेघना सिम्ते, सैम तनेजा और देबजानी घोष की भी है। अलग-अलग परिवेशों और सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमियों से आईं ये लड़कियाँ किस तरह एक-दूसरे के साथ खड़ी होकर इस पुरुषवादी समाज के एक और हमले का मुक़ाबला करती हैं—‘भली लड़कियाँ, बुरी लड़कियाँ’ उसी की कहानी है।

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    पूजा प्रकाश दुनिया में कोई क्रांति नहीं लाना चाहती। लेकिन उम्र का तक़ाज़ा ही कहिए कि
    आज से नहीं बल्कि पीढियों से जिंदगी के सालों में लगनेवाली अठारहवीं गिरह हमेशा
    बगावतों के नाम की ही होती है।
    वैसे, अठारह की हुई नहीं थी अभी पूजा| चार-छह महीने बाक़ीथे। फिर भी खुद को, और
    अपनी छोटी-सी दुनिया को, अपनी उम्र याद दिलाती फिरती।
    “याद है न! इस साल चार जुलाई को अठारह साल के हो जाएंगे हम अम्मा। वोट देंगे,
    पसंद की सरकार चुनेंगे। ड्राइविंग लाइसेंस लेंगे। चाहें तो शादी भी कर लें भाग के| समझी
    तुम…
    मेरी अम्मा रानी!”
    अम्मा रानी को चिढ़ाने के लिए इतनी खुराक बहुत होती।
    आपको बेशक पूजा प्रकाश की ऐसी बातों से जवाँ बलवे की ताज़ा ख़ुशबू आती हो,
    लेकिन पूजा का इरादा दुनिया में किसी किस्म के राजनीतिक या सामाजिक बदलाव लाने
    का बिल्कुल भी नहीं था।
    अठारह साल की लड़की के लिए इससे भी बड़ी कई और लड़ाइयाँ होती हैं।
    मिसाल के तौर पर, बारहवीं में जिले में नहीं तो कम-से-कम स्कूल में टॉपर की कुर्सी
    पर अपना कब्ज़ा बरकरार रखते हुए इतने नंबर तो ले ही आना कि दिल्ली विश्वविद्यालय के
    बेस्ट तुमेंस कॉलेज में कम-से-कम एडमिशन मिल जाए, हॉस्टल वाहे मिले न मिले।
    मुज़फ्फरपुर के डीएवी पब्लिक स्कूल में पढनेवाली इस लड़की—पूजा प्रकाश की
    ख्वाहिशें इतनी ही छोटी और ‘विमेंस लिब’ की परिभाषा इतनी ही दीन-हीन थी।

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    इस पुस्तक के लेखक

    अनु सिंह चौधरी / Anu Singh Choudhary
    + लेखक की अन्य किताबें

    फ़िल्मकार, स्क्रीनराइटर, एडिटर, अनुवादक, स्तंभकार, एक्स-पत्रकार। यानी दूसरे शब्दों में 'मौक़ापरस्त’! मूलत: बिहार से। 'नीला स्कार्फ़’ (कहानी-संग्रह; 2014) और 'मम्मा की डायरी’ (कथेतर; 2015) हिन्द युग्म से प्रकाशित। ये दोनों किताबें दैनिक जागरण नील्सन बेस्टसेलर सूची में शामिल हो चुकी हैं। ‘मम्मा की डायरी’ मदरहुड-पैरेंटिंग विषय पर हिंदी में लिखी गई अपनी तरह की पहली और एकमात्र किताब है। 'गाँव कनेक्शन’ के लिए रिपोर्टिंग करते हुए रामनाथ गोयनका अवॉर्ड और लाडली अवॉर्ड मिला। इन दिनों मुंबई, दिल्ली, पूर्णिया और गैंगटोक के बीच कहीं ठिकाने की तलाश में हैं।

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