बनारस टॉकीज / Banaras Talkies by Satya Vyas Download Free PDF

पुस्तक का अंश :

दर्शकों के समक्ष भरोसा हासिल करना

दर्शकों के सम्मुख अक्सर एक असाधारण उत्तेजना का अनुभव होता है। दर्शकों की उत्सुकता से भरी आँखें इस उत्तेजना को जन्म देती हैं। दर्शकों की आँखों से आँखें मिलाने पर यह उत्तेजना और प्रखर हो जाती है। अधिकतर वक्ता इस अनजाने लेकिन वास्तविक माहौल में फैली, महसूस की जानेवाली, क्षणिक एवं बयान न की जा सकनेवाली सिहरन से उत्तेजित होते रहे हैं। अधिकतर लेखक यह भी मानते हैं कि वक्ता की आँखें दर्शकों को आकर्षित करने का भी काम करती हैं। यह एक ऐसा प्रभाव है, जो मौजूदा चर्चा में शामिल चित्रण के विपरीत है। वक्ता पर दर्शकों की गड़ी आँखों का प्रभाव केवल शुरुआती दौर में पड़ता है जैसे ही वाक्पटुता का सौंदर्य प्रकाशित होता है, दर्शकों की आँखों में छुपा भय छँटने लगता है।

विलियम पिटेंजर, तात्कालिक भाषण

सार्वजनिक तौर पर बोलने का प्रशिक्षण ले रहे छात्र अकसर पूछते हैं कि ‘दर्शकों के समक्ष व्याकुलता और भय की भावना पर कैसे काबू पाया जाए?” रेलगाड़ी में सफर करते समय क्या आपने कभी पास के मैदानों में घास चर रहे उन घोड़ों की तरफ ध्यान दिया है, जो रेलगाड़ी की घड़घड़ाहट के बावजूद एक बार भी सिर उठाकर नहीं देखते, जबकि थोड़ी दूरी पर स्थित

स्टेशन के पास से जब रेलगाड़ी गुजरती है तो किसान की पत्नी डरे हुए घोड़े को सँभालने में जुटी नजर आती है? गाड़ियों की आवाज से डरनेवाले घोड़े का भय दूर करने का क्या उपाय है? क्या उसे ऐसे दूर-दराज इलाके में चराया जाए, जहाँ मोटरगाडियाँ न आती हो या उसको ऐसी जगहों पर अकसर ले जाना चाहिए, जहाँ आम तौर पर मशीनों की घड़घड़ाहट सुनने को मिलती हो ? इस उदाहरण के जरिए अपने भीतर छुपे व्याकुलता और भय को दूर करो दर्शकों का बार-बार सामना करने से

हिचकिचाहट दूर हो जाती है। किसी लेख को पढ़कर मंच के भय से मुक्त होना संभव नहीं है। पुस्तक के जरिए पानी में बरताव करने के उत्तम सुझाव तो मिल सकते हैं, लेकिन तैराकी सीखने के लिए पानी में छलाँग लगानी हो पड़ती है। हालाँकि आजकल कई ऐसी तैराकी की पोशाकें मौजूद हैं, जिनको पहनकर समुद्र के किनारे भी गीला हुए बिना मौज-मस्ती की जा सकती है; लेकिन इन पोशाकों को पहनकर तैरना नहीं सीखा जा सकता। तैराकी सीखने के लिए पानी में कूदना ही एकमात्र रास्ता होता है।

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