Home साहित्य / Literature दलित साहित्य / Dalit Sahitya बहुजन साहित्य की प्रस्तावना / Bahujan Sahitya Ki Prastaawanaa

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना / Bahujan Sahitya Ki Prastaawanaa

पुस्तक नाम : बहुजन साहित्य की प्रस्तावना / Bahujan Sahitya Ki Prastaawanaa
Book Language : हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज़ : 1.7 MB
  • कुल पृष्ठ : 189

  • "बहुजन साहित्य की प्रस्तावना" शीर्षक यह किताब हिन्दी और भारतीय भाषाओं में बहुजन साहित्य की अवधारणा पर विमर्श प्रस्तुत करती है। एक ओर यह किताब हिंदी साहित्य में हो रहे बदलावों पर नजर रखती है दूसरी ओर मंडल कमीशन के लागू होने के बाद बदल रहे समाज व राजनीतिक परिदृश्यों के सापेक्ष साहित्य के क्षेत्र में शुरू हुई नई बहस के बुनियादी तत्वों को रेखांकित भी करती है। आज के भारतीय परिप्रेक्ष्य में बहुजन तबके हैं- अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जनजातियां, अनुसूचित जातियां, विमुक्त घूमंतू जातियां, पसमांदा अल्पसंख्यक व स्त्रियां । बहुजन साहित्य की अवधारणा इन सभी की पीड़ाओं में समानता देखती है तथा इनके शोषण के कारणों को कमोबेश समान पाती है। यह किताब साहित्य के शोधार्थियों के लिए जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही साहित्यिक नजरिए को समझने की आकंक्षा रखने वाले जागरूक लोगों के लिए भी और उनके लिए भी जो स्वयं को बहुजन का हिस्सा मानते हैं। फिर चाहे वे सामाजिक कार्यकर्ता हों या फिर राजनेता। बहुजन विमर्श से जुड‍़े सभी सवालों का यह किताब उत्तर देती है।

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    साहित्य की दुनिया में निष्कर्ष से अधिक महत्वपूर्ण निष्कर्ष तक पहुंचने की प्रकिया होती है। जब हम कोई उपन्यास पढ़ रहे होते हैं, तो हमारे लिए क्लाइमेक्स से अधिक महत्वपूर्ण उसमें आया जीवन होता है। यही बात कविता, कहानी व साहित्य की अन्य विधाओं के बारे में भी सही है और प्रकरांतर से यही बात इस किताब पर लागू होती है। फारवर्ड प्रेस पत्रिका में चले साहित्य संबंधी बहस-मुबाहिसे में से चुने हुए इन लेखों में आप एक जीवंत वैचारिक ऊष्मा पाएंगे। यह
    किताब बहुजन साहित्य की अवधारणा के नक्शे की निर्माण प्रक्रिया से आपका परिचय कराएगी तथा आप इसके विविध रूपों पर हुई बहसों की तीखी तासीर को महसूस कर पाएंगे। ये बहसें
    आपको एक सुविंतित निष्कर्ष की ओर ले जाएं, इतनी ही इनकी भूमिका है। यही साहित्य का काम है और यही आलोचना का भी। निष्कर्ष तो आपको स्वयं ही तय करने होते हैं।
    मासिक फारवर्ड प्रेस का प्रकाशन मुद्रित पत्रिका के रूप में मई, 2009 से जून, 2016 तक हुआ।
    एक जून से यह पत्रिका स्वतंत्र वेबपोर्टल में रूपांतरित हो गई है। बहुजन साहित्य की अवधारणा पर रचनाओं और आलोचना का प्रकाशन इसके वेब पोर्टल पर भी जारी है। इस किताब में संकलित लेख इस विमर्श के आरंभिक दौर के हैं। आज यह यात्रा वहां से कई पायदान आगे बढ़ चुकी है, फिर भी ये आरंभिक लेख इस पूरी प्रकिया को समझने के लिए आवश्यक हैं। किताब में
    लेखों का क्रम प्रकाशन के समय के आधार पर न रखकर विषय के आधार पर रखा गया है, ताकि आप इस विमर्श को अधिकाधिक आत्मसात कर सकें।
    बहुजन साहित्य की अवधारणा अपने आप में एकदम सीधी है – अभिजन के विपरीत; बहुजनों का साहित्य जैसा कि ढाई हजार साल पहले बुद्ध ने कहा था – बहुजन हिताय, बहुजन सुखाया
    लेकिन इस संबंध में कुछ महत्वपूर्ण चीजों को भी ध्यान में रखना चाहिए। बहुजन साहित्य…

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    प्रमोद रंजन / Pramod Ranjan
    प्रमोद रंजन (फरवरी 1980 में जन्म) एक भारतीय लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार हैं। उन्होंने भारतेन्दु शिखर ( शिमला ) , ग्राम परिवार , धर्मशाला स्थित दिव्य हिमाचल , पंजाब केसरी , दैनिक भास्कर , अमर उजाला के लिए काम किया है। वह फारवर्ड मासिक पत्रिका के संपादक हैं ।
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