अमरनाथ यात्रा / Amarnath Yatra PDF Download Book Free by AMIT KUMAR SINGH

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यात्रा जीवन का रोमांच है। यात्रा का बाहरी-सुख अंतस के आनंद को भी झंकृत करता है। इसलिए यात्रा करना जहाँ आनंदप्रद होता है; वहीं यह उस स्थान की सभ्यता-संस्कृति को भी जानने का अवसर देती है। तीर्थ स्थलों की यात्रा आनंद के साथ-साथ हमें भक्ति और श्रद्धा से ओत-प्रोत कर देती है।

पुस्तक का अंश :

अमरनाथ जा रहे हैं !

सैर कर दुनिया की गाफिल, जिंदगानी फिर कहाँ ? जिंदगी गर कुछ रही तो नौजवानी फिर कहाँ ?

उमस भरी गरमी की शाम थी।

मेरे मित्र प्रीतम का फोन आते ही मैं थोड़ा विचलित हो गया था। मुझे पता था, वह क्या पूछेगा? उसके प्रश्न का उत्तर देने के लिए मैं मानसिक रूप से तैयार नहीं था। फलतः मेरा असहज होना स्वाभाविक था।

“अमित जी, अमरनाथ चलना है, न?”

प्रीतम ने बिना किसी भूमिका के यह प्रश्न किया। इस प्रश्न का क्या जबाव दूँ, मुझे कुछ नहीं सूझ रहा था। मेरे दिल और दिमाग के मध्य भयंकर अंतद्वंद्व चलने लगा।

बचपन से मेरे मन में एक जिज्ञासा थी कि अधिकांश संत और ऋषि हिमालय की यात्रा पर क्यों जाते हैं? कश्मीर को लेकर भी मेरे मन में एक रूमानी खयाल था। ‘कितनी खूबसूरत ये तसवीर है, ये कश्मीर है, ये कश्मीर है’… ‘बेमिसाल’ फिल्म का यह गीत अमिताभ बच्चन,

राखी और विनोद मेहरा पर फिल्माया गया था। यह गीत बार-बार मुझे कश्मीर का स्मरण कराता था।

मेरा शोध कार्य भी भारत-पाकिस्तान से संबंधित है। कश्मीर भारत-पाकिस्तान संबंध का एक विवादित पहलू है। भारत-पाकिस्तान संबंध को कश्मीर के लोगों का दृष्टिकोण भी सीधे प्रभावित करता है। फलतः कश्मीर के लोगों से मिलने और इस संबंध में उनके दृष्टिकोण को समझने में मेरी गहरी दिलचस्पी थी, परंतु इसका सुअवसर मुझे कभी

नहीं मिल पाया था।

मेरे चेहरे में चिंता की लकीर को मेरी पत्नी सोनिया तुरंत भाँप गई। हमेशा की तरह।

“कहाँ खो गए हैं, जनाब!” सोनिया के इस वाक्य में चुहलबाजी थी।

” मैं परसों अमरनाथ यात्रा के लिए जा रहा हूँ।” बिना साँस लिये जल्दबाजी में यह कहकर मौन हो गया। सोनिया का कोई प्रत्युत्तर नहीं आया, लेकिन उसके चेहरे पर तनाव और विक्षोभ को बड़ी आसानी से पढ़ा जा

सकता था। इससे पहले प्रीतम को मैंने यही जवाब दिया था—’यार, मैं तुम्हें अमरनाथ यात्रा के बारे में अपना निर्णय कल

बताता हूँ।’ मेरे और सोनिया के बीच बहुत देर तक कोई संवाद नहीं हुआ। कारण मेरे द्वारा लिया गया यह निर्णय था। इस चुप्पी के तनाव को मेरे बड़े बेटे ओशी ने तोड़ा-“पापा, कल मुझे मार्केट से बड़ी वाली बॉल दिला रहे हो

न?”

बड़ी वाली बॉल से उसका आशय फुटबॉल से था।

” मेरे साथ, तुम्हें खेलना भी होगा।” उसके इस वाक्य में वात्सल्य भरा दबाव था। “तुम्हारे पापा अमरनाथ जा रहे हैं।”

बाप-बेटे के इस संवाद में सोनिया के हस्तक्षेप से चारों ओर पसरे तनाव में अब मेरा बेटा भी शामिल हो चुका

था।

मेरे पास चुप्पी के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं था। मेरा यह निर्णय अप्रत्याशित था। ग्यारह महीने के एक छोटे से बेटे को छोड़कर मित्रों के साथ इस जोखिम भरी यात्रा में जाने का निर्णय अटपटा था। कुछ हद तक असंवेदनशील भी, क्योंकि इतने छोटे बच्चे को अकेले सँभालना एक ऐसी महिला के लिए आसान नहीं था, जिस पर एक सात साल के लड़के की भी जिम्मेवारी हो ।

अमरनाथ यात्रा निर्णय के पश्चात् मुझमें भी थोड़ा अपराध बोध था। यह अपराध-बोध क्या था? मैं इसे साफ साफ समझ पाने में सक्षम नहीं था। क्या मेरा अचानक निर्णय लेना ही मुझे गलत लग रहा था, क्योंकि अमूमन हम और सोनिया कोई निर्णय साथ-साथ लेते हैं। छोटे से बच्चे को छोड़कर जाना मुझे कुछ असहज कर रहा था या फिर अमरनाथ यात्रा की जोखिम भरी यात्रा का निर्णय मुझे भी समझ नहीं आ रहा था।

मैं विचित्र मनोदशा में था, परंतु बुद्ध के जीवन प्रसंग ने मुझे सहारा दिया था। बुद्ध ने जब ज्ञान प्राप्ति के लिए घर छोड़ा, उस समय उनका बेटा मात्र चार दिनों का था। बुद्ध जिस रात अपनी सोती हुई पत्नी यशोधरा और बच्चे राहुल को छोड़कर जा रहे थे, उसी वक्त उन्होंने अपने सोते हुए बच्चे को देखा था। चार दिनों के उस शिशु को सोते हुए देखकर वे अपने को कमजोर महसूस कर रहे थे, लेकिन अंततः उन्होंने अपने को सँभाला। अपने मन को

उन्होंने कड़ा किया और आधी रात को सत्य की खोज में निकल पड़े। मैंने इस घटना का वर्णन ओशो की एक पुस्तक में बहुत पहले पढ़ा था। आज वही पढ़ा हुआ प्रसंग मेरे निर्णय को साहस प्रदान कर रहा था।

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