औघड़ | Aughad

पुस्तक नाम : औघड़ | Aughad
Book Language : हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज़ : 2.5 MB
  • कुल पृष्ठ :

  • 'औघड़' भारतीय ग्रामीण जीवन और परिवेश की भाषा पर लिखा गया उपन्यास है जिसमें अपने समय के भारतीय ग्रामीण-कस्बाई समाज और राजनीति की गहरी पड़ताल की गई है। एक युवा लेखक द्वारा इसमें उन पहलुओं पर बहुत बेबाकी से चिपकाया गया है जिन पर पिछले दशक के लेखन में युवाओं की ओर से कम लिखी गई है। 'औघड़' नई सदी के गाँव को नई पीढ़ी के नजरिये से देखने का गहरा प्रयास है। महानगरों में निवासते हुए ग्रामीण जीवन की ऊपरी सतह को उभारने और भदेस का छौंका मारकर लिखने की बारी शैली से अलग, 'औघड़' गाँव पर गाँव में रहकर, गाँव का पूरा लिखा गया उपन्यास है। ग्रामीण जीवन की कई परतों की तह उघाड़ता यह उपन्यास पाठकों के समक्ष कई मूल्यों को भी प्रस्तुत करता है। इस उपन्यास में भारतीय ग्राम्य व्यवस्था के सामाजिक-राजनैतिक ढाँचे की विसंगतियों को बेहद साहसिक तरीके से उजागर किया गया है। 'औघड़' धार्मिक पाखंड, जात-पात, छुआछूत, महिला की दशा, राजनीति, अपराध और प्रशन के तारणक गठजोड़, सामाजिक व्यवस्था की डिकन, संस्कृति की टूटन, ग्रामीण मध्यम वर्ग की चेतना के भ्रम इत्यादि विषयों से गुरेज करने के बजाय, इनपर बहुत ठहरकर विचारता और प्रचार करता चलता है। व्यंग्य और गंभीर संवेदना के संतुलन को साधने की अपनी चिर-परिचित शैली में नीलोत्पल मृणाल ने इस उपन्यास को लिखते हुए हिंदी साहित्य की चलती आ रही सामाजिक सरोकार लेखन को थोड़ा और आगे बढ़ाया है।

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    गर्मी जा चुकी थी, ठंड अपना लाव-लश्कर ले आई थी भोर के चार बजे थे, रात के सन्नाटे का एक टुकड़ा अभी भी बचा हुआ था। हल्की-हल्की शीतल हवा चल रही थी।

    मुरारी साव एक घियाई रंग की पतली डल वाली भगलपुरिया चादर ओढ़े अपनी चाय दुकान पर पहुँच चुका था। दुकान क्या थी, एक टाट की झोपड़ी थी, उसी में माटी का एक चूल्हा था और उससे लगा एक लकड़ी का बक्सा। दोनों तरफ एक-एक बेंच रखी हुई थी।

    मुरारी साव की चाय की दुकान गाँव के बस स्टैंड वाले मुख्य चौराहे पर ही थी।

    गाँव में लोग अक्सर सूरज से पहले जग जाया करते, उसमें भी सबसे पहले भोर मुरारी साव की चाय दुकान पर ही होती। 5 बजे सुबह से ही गाँव के रास्ते सवारियों का आना-जाना शुरू हो जाता। गाँव से होकर गुजरने वाली गाड़ियों की सवारियों के लिए मुरारी की दुकान की मिट्टी के कंतरी वाले असली दूध की बनी चाय सुबह-सुबह की एक आदत सी बन गई थी। यही कारण था कि मुरारी तड़के दुकान खोलने पहुँच जाता।

    जब तक गाँव के लोग सो उठकर सूर्य देव के दर्शन करते, तब तक मुरारी ठीक-ठाक लक्ष्मीदर्शन कर चुका होता था। रोज की तरह आते ही मुरारी ने बक्से का ताला खोल बर्तन निकाला। हालाँकि, लकड़ी का वो बक्सा इतनी जगह से टूटा हुआ था कि बिना ताला खोले भी बर्तन निकाला जा सकता था पर ताला एक भरोसा देता है और ये गाँव का ही माहौल था कि भले दीमकों ने बक्से की लकड़ी खा ली थी लेकिन एक जंग खा रहे छोटे से ताले के भरोसे की लाज आज तक कायम थी न आज तक मुरारी का ताला टूटा, न भरोसा और न एक चम्मच तक चोरी हुआ होता भी कैसे? गाँव के भले से लेकर उचक्के तक सब के लिए सुबह मीठी करने का इंतजाम मुरारी ही तो करता था। जिस दिन मुरारी की दुकान न खुले, कुछ लफुए तो सुबह से ही ताड़ी पीने निकल जाते वो तो मुरारी की मस्त चाय थी जिसने उन्हें अपनी ओर खींचे रखा था वर्ना सुबह उठकर चाय पीने का रिवाज अब गाँव से भी धीरे धीरे जाता रहा था।

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    नीलोत्पल मृणाल / Nilotpal Mrinal
    साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार से सम्मानित नीलोत्पल मृणाल 21वीं सदी की नई पीढ़ी के सर्वाधिक लोकप्रिय लेखकों में से एक हैं, जिनमें कलम के साथ-साथ राजनैतिक और सामाजिक मुद्दों पर ज़मीनी रूप से लड़ने का तेवर भी हैं। इसीलिए इनके लेखन में भी सामाजिक विषमताएँ, विडंबनाएँ और आपसी संघर्ष बहुत स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होते हैं। लेखन के अलावा लोकगायन और कविताई में बराबर गति रखने वाले नीलोत्पल ने अपने पहले उपन्यास 'डार्क हॉर्स' के बरक्स 'औघड़' में ग्रामीण भारत के राजनैतिक-सामाजिक जटिलता की गाँठ पर अपनी कलम रखी है।
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